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आओ मै अपना गाँव दिखाऊ


मुझे याद है फोचाय मरर का वह गीत "कखन हरब दुख मोर हे भोलानाथ "इसी गीत से हमारी सुबह की शुरुआत होती थी .फोचाय मरर के इस गीत के साथ शुरू होती थी कई आवाजे ..... मवेशियों के गले मे बंधी घंटिया ,किसानो की चहल पहल ... दूर से आती ढेकी की आवाज ... उखल समाठ की आवाज ... अल सुबह की ये सारी आवाजे मिलकर एक मेलोडी बना रही थी. कह सकते है कि मिथिला के गाँव की यह सास्वत पहचान थी . सामाजिक सरोकार का  विहंगम दृश्य मिथिला के हर गाँव मे मौजूद था . जहाँ हर आदमी हर की जरूरत में शामिल था . अपने इसी गाँव को तलाशने मै काफी अरसे के बाद गाँव पंहुचा था .फोचाय मरर के कखन हरब दुख मोर हे भोला नाथ सुनने के लिए मै सुबह से ही तैयार बैठा था ... लेकिन न तो फोचाय मरर की आवाज सुनाई दी न ही कही से मवेशियों की घंटी की आवाज ,न ही कही किसानो की चहल पहल .. ढेकी और उखल न जाने कब के गायब हो चुके थे . गाँव का वह नैचुरल अम्बिंस खो गया था ..या यूँ कहे की गाँव पूरी तरह से निशब्द हो गया था . मायूसी के साथ मै उठा उस अम्बिंस को तलाशने जो मेरे दिलो दिमाग में रचा बसा था .. शायद इस भ्रम में कि विद्यापति खो गए तो क्या हुआ लोडिक सलहेस तो जिन्दा होगा ..  दूर से आती आवाज मुझे आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया .... निशब्द गाँव में छन छन कर आती ये आवाज मुझे उद्वेलित कर रही थी .  तेज तेज क़दमों से मुझे भागते हुए देखकर एक बुजुर्ग ने आवाज लगायी ..मोर्निग वाक् ... मैंने कहा बस ऐसा ही .. मै उस आवाज के बिलकुल करीब था .
सुबह के ७ बजे होंगे तमाशबीन की भीड़ देखकर पहले तो मै चौका लेकिन सामने आने पर नज़ारा साफ़ हो गया था . मंच पर पसीने से तरबतर १५ -१६ साल की एक नेपाली कन्या और उसके साथ झूमते दो तीन नौजवान  ...बेक ग्राउंड से आती उन्मुक्त और अश्लील भोजपुरी गीत .... किसी ने  जोर से आवाज लगायी यहाँ आये बिलकुल पास में ... ये नेपाल का  मशहूर ओर्केस्ट्रा पार्टी है .. भीड़ से बज रही सीटियों की आवाज मुझे उन्मुक्त करने के वजाय भेद रही थी ...फोचाय मरर की तलाश में मै आगे बढ़ गया ..अपने गाँव को खोजने .....
आर्थिक तरक्की ने गाँव का स्वरुप बदल दिया है .. खेत खलिहान भले ही खाली हो गए हों लेकिन मोनिओर्देरइकोनोमी ने गाँव को बाजार से सीधे जोड़ दिया है . आर्थिक विशेज्ञ मानते है कि भारत के गाँव मे बढा उपभोक्तावाद ने भारतीय अर्थव्यवस्था में मजबूती दी है . यानि रेसेसिओन के इस दौर में भी हमारी आर्थिक प्रगति ७ फीसद के करीब है तो इसका श्रेय गाँव को ही जाता है . लेकिन यह अर्थशास्त्र मेरी  समझ से यहाँ बाहर है . उद्योग के नाम पर दूर दूर तक कोई नामोनिशान नहीं है . लेकिन  हर चौक चौराहे पर देशी विदेशी शराव के ठेके मौजूद है . कोल्ड्रिंक से लेकर तमाम शहरी जीवन शैली लोगों की आम जरूरत में शामिल हो गयी है . अब यादव जी ने अपना खटाल बंद कर दिया है उनके बच्चों ने सुधा दूध का डिपो खोल दिया है ... अब भैस की जगह इनके दरवाजे पर सुबह सुबह मुजफ्फरपुर से गाडी आती है जो दूध से लेकर दही तक ,घी से लेकर लस्सी तक हर चीज लोगों को मुहैया करा जाती है ... ध्यान रहे यहाँ कोई उधार नहीं है ..एकदम नगदी वो भी कैश ....
क्या यह सबकुछ गाँव नेकुछ खोकर पाया है ...८० के दशक में गाँव से शुरू हुआ भारी पलायन ,ग्रामीण अंचलों में एक बड़ी त्रासदी के रूप में सामने आई . गाँव के तमाम पारंपरिक उद्योग ठप पड़ गए ,पहले मजदूरों का पलायन हुआ बाद में किसानो का ..
लेकिन इस पलायन ने गाँव की तस्वीर बदल दी ... लोगों के स्टाइल बदल दिए ,यहाँ की संस्कृति बदल दी ..लेकिन क्या हमने जो चमक पाई है वह स्थायी है ... कभी मुंबई तो कभी दिल्ली तो कभी पंजाब तो कभी इंदौर हमें मुहं चिढ़ता है ,हमारे श्रम का उपहास करता है ,कभी खदेड़ता है तो कभी पुचकारता है . पंजाब में खेतिहर मजदूरों की कमी हो जाती है ,उनके सीजनल उद्योग में मजदूरों की कमी होती है तो हमारे सस्ते मजदूरों के लिए सरकारी स्तर पर प्रयास करते है लेकिन काम निकलते ही ये मजदूर भइया बनजाते है ..बिहारी बन जाते है . बिहार से आया एक नौजवान मुझे एक सवाल करता है कि बिहार के गाँव के एक किसान पांच छः एकड़ के मालिक होते हुए भी दिल्ली और मुंबई में मजदूरी करता है लेकिन दिल्ली और मुंबई के एक आध एकड़ जमीं के मालिक करोड़ पति बन जाते है ... जमीन का यह अर्थशात्र हमारी व्यवस्था ने वनाई है ..पिछले ६० साल की हमारी व्यवस्था ने सिर्फ शहरों को बनाया है ,देश के संसाधन को झोंक कर शहरों की भीड़ बढा दी है लेकिन गाँव को तरक्की की धारा से पूरी तरह काट दिया है ... अभी जारी है .....

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Mohalla Live

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भारतीयों के दिल पर लिखी इबारत को हुक्मरान भी सुनें

Posted: 15 Nov 2009 12:30 AM PST

मज़्कूर आलम ♦ वनडे के 17 हजारी सचिन, टेस्ट में 13 हजार की दहलीज पर खड़े सचिन और अंतरराष्‍ट्रीय क्रिकेट में श्रीलंका दौरा में 30 हजार पूरा करने जा रहे सचिन, शतकों के शतक से 13 शतक पीछे सचिन के दो दशक पूरा करने पर हमें नाज है और आइए हम 15 नवंबर 2009 को उनके क्रिकेटीय जीवन के दो दशक पूरा करने पर एक सच्चे खेल प्रेमी की तरह उनके लिए क्लैपिंग करें। और मुझे इस बात का पूरा विश्वास है कि जब तक सचिन भारतीय टीम में हैं, क्रिकेट की तमाम अनिश्चितताओं के बाद भी भारतीय क्रिकेट सुरक्षित हाथों में है। देश के एक-एक कोने से सचिन के दीवाने इस तरह की अहमकाना नफ़रत की दीवार गिरा कर सचिन का जोश बढ़ाते रहेंगे।


सावधान, इंटरनेट पर सीआईए आपकी जासूसी कर रहा है!

Posted: 14 Nov 2009 09:52 PM PST

जगदीश्‍वर चतुर्वेदी ♦ अमेरि‍की गुप्‍तचर संस्‍था सीआईए ने अपने पैर इंटरनेट पर रख दिये हैं। सीआईए की नज़रदारी का काफी गंभीर अर्थ है। अब सीआईए के ई जासूस आपके ब्‍लॉग पढ़ना चाहते हैं। ट्वि‍टर और फेसबुक में आप क्‍या कर रहे हैं, उसे देखना चाहते हैं। यहां तक कि‍ वे यह भी जानना चाहते हैं कि‍ इंटरनेट से आप कौन सी कि‍ताब अमाजॉन से ख़रीद रहे हैं, कौन सी कि‍ताब आप इंटरनेट पर पढ़ रहे हैं - इस सबका हि‍साब सीआईए तैयार कर रहा है। अमेरि‍का की एक नि‍वेश कंपनी इन क्‍यू टेल ने अपनी पूंजी का बड़ा हि‍स्‍सा इस क्षेत्र में नि‍वेश करने का फ़ैसला लि‍या है। यह फर्म सीआईए की सहयोगी कंपनी है।


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Mohalla Live

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संस्‍कृति के दर्पण में ये जो शक्‍लें हैं मुस्‍कातीं !!!

Posted: 13 Nov 2009 11:40 PM PST

कम बजट का हादसा

tum mile front अब्राहम हिंदीवाला ♦ तुम मिले हिंदी फिल्‍मों में चल रहे मीडियॉकर काम का ताज़ा नमूना है। बजट नहीं है। फार्मूला है कि अपने घर के स्‍टार को लो। उसके साथ कम पॉपुलर और सस्‍ते में हीरोइन लो। Read the full story »

जेल अच्‍छी फिल्‍म है

jal front अब्राहम हिंदीवाला ♦ फिल्‍म देखते समय हम जेल के अंदर की दुनिया से परिचित होते हैं। कैदी कितने असहाय होते हैं? समस्‍या यह हो गयी है कि हर फिल्‍म में हम मनोरंजन चाहते हैं। Read the full story »
भुवन भास्‍कर ♦ संस्कृति मंत्रालय को दुधारू गाय मान कर इसे निरंतर दूहने वाले लोगों कि कमी नहीं है। इनमें कई तो इतने शातिर हैं कि देखते ही देखते मात्र पिछले 5-7 सालों में ही करोड़पति बन चुके हैं।


औकात नहीं है, तो हाथ ही न लगाओ

Posted: 13 Nov 2009 09:48 PM PST

अब्राहम हिंदीवाला ♦ तुम मिले की पृष्‍ठभूमि में 26 जुलाई 2005 को मुंबई में आयी बाढ़ है। इस बाढ़ ने कई ज़‍िंदगियां तबाह कर दी थीं। इसके प्रभाव का अनुमान इसी तथ्‍य से लगाया जा सकता है कि आज भी तेज़ बारिश होती है तो 26 जुलाई की स्‍मृतियां घुमड़ने लगती हैं। उस हादसे को कुणाल देशमुख ने सीमित बजट के कारण निबटा दिया है। इस फिल्‍म में स्‍पेशल इफेक्‍ट और बाढ़ के दृश्‍यों के रीक्रिएशन के लिए भारी सोच, तैयारी और ध्‍यान की ज़रूरत थी। इस फिल्‍म में हादसा भी हास्‍यास्‍पद हो गया है। ख़तरा और डर महसूस ही नहीं होता। फिल्‍म देखते हुए रोंगटे खड़े नहीं होते। उल्‍टे हंसी आती है।


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युद्व का उन्माद और सोल्जर ब्लू


उमेश पंत
www.naisoch.blogspot.com
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युद्व का उन्माद कितना विभत्स, कितना भयावह और अमानवीय हो सकता है सोल्जर ब्लू में देखा जा सकता है। ये एक अमेरिकन फिल्म है। इतिहास में झांकती, जंग के मैदान में ले जाती और उस मनहस्थिति से रुबरु कराती जो एक आदमी को निहायत जंगली बना देने पर उतारु कर देती है। जो एक सभ्यता के असभ्य हो जाने की अन्तिम सीमा तक पहुंचने की यात्रा दिखाती है। फलतह आदमी के अमानवीय हो जाने की दर्दनाक सच्चाई को खुलकर अपने नग्न रुप में हम तक पहुंचाती है। और कुछ सवाल छोड़ जाती है कि क्या यह सब सच भी हो सकता है। इन्सान क्या इतना निर्मम हो सकता है। इतना निरीह। राहुल सांस्कृत्यायन ने जब वोल्गा से गंगा लिखी तो क्या तो उसकी पूरी शाब्दिक यात्रा महज काल्पनिक ही रही होगी। लेकिन इतिहास ही नहीं वर्तमान भी इस पूरी निर्मम कहानी का साक्षी रहा है। वोल्गा से गंगा मेेें एक औरत अपने नवजात बच्चे को पटक कर फेंक देती है उसके खून से सने लोथड़ों को देख उसे कतई दुख नहीं होता। उसे लड़ना है। खुद के अस्तित्व को बचाने के लिए। खुद के कबीले को जिंदा रखने के लिए। उसे पढ़ते हुए लगता है कि यह सब एक कल्पना है जिसकी निरीहता से सच्चाई का कोई लेना देना हो ही नहीं सकता। लेकिन फिर सोल्जर्स ब्लू जैसी फिल्में हमें देखने को मिलती हैं। जिनका नरसंहार पूरी तरह ऐतिहासिक सच्चाईयों पर आधारित है। फिल्म 1864 में अमेरिकी फ्रंटियर के कालेरेडो में कर्नल जान एम सिविंगटन के नेतृत्व में हुए भयावह नरसंहार की पृष्ठभूमि पर आधारित है जहां शेन और अर्फाहो नाम के दो सुदूरवर्ती गांवों को नेस्तनाबूत कर दिया गया।
क्रेस्टा (केन्डिक बर्गन) और हानस (पीटर स्टास) शेन(cheyenne) गांव की ओर जा रहे हैं। मात्र ये दोनों ही कावर्ली में भारतीयों के द्वारा किये गये हमले में बच पाये हैं। इस हमले में 22 लोगों को मार दिया गया। बचने के बाद दोनो शेन गांव में बने बेसकैंप की तरफ जा रहे हैं। हानस एक अमेरिकी सिपाही है जो युद्व की इस संस्कृति को पसंद नहीं करता। क्रेस्टा दो साल शेन गांव में रही है। वो अमेरिकी सेना के खिलाफ है। उसे शेन गांव से एक लगाव है। लेकिन हानस को उसका ये लगाव पसंद नहीं है।
आगे पढें...www.picturehaal.blogspot.com

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सचिननामा -२० साल एक भगवान्


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एनएसडी से मांगा शशि भूषण की मौत का हिसाब

Posted: 13 Nov 2009 12:54 AM PST

अपने अपने पुरुष!

painting front चंडीदत्त शुक्‍ल ♦ नीले बैकग्राउंड वाले चित्र में आवरण-हीन पुरुष की पीठ है। उसमें आंखें हैं और लाल रंग से उकेरी गयीं मछलियां। ये अपनी ज़िम्मेदारियों से भागते पुरुष की चित्त-वृत्ति का पुनर्पाठ ही तो है! Read the full story »

जेल अच्‍छी फिल्‍म है

jal front अब्राहम हिंदीवाला ♦ फिल्‍म देखते समय हम जेल के अंदर की दुनिया से परिचित होते हैं। कैदी कितने असहाय होते हैं? समस्‍या यह हो गयी है कि हर फिल्‍म में हम मनोरंजन चाहते हैं। Read the full story »
डेस्‍क ♦ सुधीर सुमन ने कहा कि शशि जैसे लोग जो बिना किसी पारिवारिक बैकग्रांउड से आते हैं, और अपनी पहचान बनाने को लालायित होते हैं, अकसर व्यवस्था की छलनाओं के शिकार हो जाते हैं।


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अपना गांव अच्छा नहीं लगा.


अभी एक-दो दिन पहले ही अपने गांव से लौटा हूं, इस बार मेरा गांव प्रवास करीब-करीब बीस दिनों का था सो मेरे पास कुछ ज्यादा टाइम था, अपने उस गांव को देखने-समझने का जहां मैं पैदा हुआ, जवान हुआ. पहले अपना गांव अच्छा लगता था, वहां के लोग और उनकी बातें सुहाती थी. वो जैसे भी थे, अच्छे थे.

वो सारे लोग मुझे अबकी बार अच्छे नहीं लगे, वो इसलिए कि आज भी मेरे गांव का भूमिहार चाहता है कि चमार, डोम, मुसहर उसे नीचे तक झुक कर सलाम ठोके, गाली सुनकर भी उन्हें (भूमिहारों को) मालिक कहे......
 आगे पढ़ने के लिए इस लिंक पर आयें- http://qalamse.blogspot.com 

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अबू आज़मी की मनसे "नौटंकी"



पिछले दिनो महाराष्ट्र की विधानसभा में जो नौटंकी हुई उसने कइयों के होश हिला कर रख दिए , वैसे मनसे के उम्मीदवारों और अबू आज़मी के समर्थकों के महाराष्ट्र में चुना जाना ऐसा था जैसे बिल्ली के भाग्य से छींका फूटना. जिस दिन विधानसभा चुनावों के परिणाम आए तब ही लोगों में उत्सुकता थी की अबू आज़मी साहब और मनसे विधानसभा में क्या गुल खिलाएँगे.
कांग्रेस और राष्ट्रवादी कांग्रेस के सरकार बनाने के ढुलमुल रवैये से सरकार बनने में करीब १५ दिन देरी हुई और बड़ा संवैधानिक संकट खड़ा हो गया जाहिर है कांग्रेस को लोगों का ध्यान मुद्दों से हटा कर कोई नाटक तो करना ही था, इसी नौटंकी में शरीक हुई कांग्रेस की कभी उत्तर प्रदेश में सहयोगी रही समाजवादी पार्टी और महाराष्ट्र में कांग्रेस द्वारा पोषित एम एन एस.

साल २००७-०८ के आखरी दिनो में जो छठ पूजा का विरोध और राज ठाकरे, अमर सिंह , आज़मी , लालू , मुलायम में बयानबाज़ी हुई यह एक सोची समझी प्लॅनिंग थी. महाराष्ट्र में भाजपा शिवसेना के वोट काटना और कांग्रेसनित गठबंधन को मजबूत करना यही इसका मकसद था. भाषाई विवाद या आम जनता से इसका कोई लेना देना न था , खुद कांग्रेस कई दफे पर्दे के पीछे से मनसे को समर्थन देती नज़र आई. जिस कांग्रेस ने गोपाल कृष्ण गोखले , सावरकर और बाल गंगाधर तिलक जैसे तेजस्वी नेताओं को नज़रअंदाज़ किया , महाराष्ट्र राज्य की स्थापना में तमाम अड़ंगे लगाए गाँधी की हत्या के बाद हज़ारों मराठी लोगों के मकान दुकान जलाए आज वही कांग्रेसी दोगला खेल खेल रहे हैं.

अपने जीवन काल में कांग्रेस के भूतपूर्व अध्यक्ष स्व. सीताराम केसरी कह चुके हैं कि मराठा मानुष कभी केंद्र में प्रधानमंत्री नहीं बन सकता , क्यूंकी आपस में मराठी व्यक्ति केकड़े की भाँति एक दूसरे के टाँग खींचते रहते हैं और कभी एकता नहीं दिखाते. कुछ हद तक यह बात सही है , लेकिन दुर्भाग्यवश केसरी जी प्रधानमंत्री बनने का अरमान अपने दिल ही में रखते हुए राम को प्यारे हो गये.

बात का रुख़ दोबारा मनसे और अबू आज़मी की तरफ ले आते हैं , शिसवेना के सामना अख़बार में लिखा था की मनसे और सपा के बीच नूरा कुश्ती चल रही है , दोनो ने विधानसभा को नाटकसभा में बनाने की कोई कसर नही छोड़ी है . हाई वोल्टेज ड्रामा खेल कर लोगों की भावनाएँ भड़का कर मीडीया में फुटेज लेते हुए अपना ब्रांड बना रहे हैं यह नामुराद नेता.

क़ानूनन कोई व्यक्ति या पार्टी किसी को बता नही सकती की उसे किस भाषा में बोलना चाहिए , लेकिन दूसरे राज्यों में रहने वाले को इतनी समझ होनी चाहिए कि जब आप किसी राज्य में २५ साल रहकर वहाँ की भाषा बोल नही पाते तो उनके नेता कैसे बन सकते हैं? अबू आज़मी के कथित तौर से हिन्दी में शपथ लेने से तो मराठी का अपमान हुआ और ही हिन्दी का सम्मान लेकिन बखेड़ा ज़रूर खड़ा हो गया !!!
अख़बारों में लिखे गए घटनाक्रम के अनुसार मनसे के रमेश वांजले और शिशिर शिंदे इन नेताओं ने अबू आज़मी के साथ हाथापाई की और एक झापड़ रसीद दिया , इसके बाद आज़मी साहब ने खूब बयानबाज़ी की मनसे को बुरा भला कहा. जब एक संवाददाता ने उनसे बाला साहब ठाकरे के बारे में पूछा तो उनके बारे में बेहद गैर ज़िम्मेदाराना बात आज़मी ने कही.

सोचने वाली बात यह है कि आज़मी किस हैसियत से ऐसी बयानबाज़ी कर रहे थे? पाठकों को याद दिला दूं सन २००४-०५ में स्टार न्यूज़ ने माफ़िया सरगना दाऊद इब्राहिम के भाई मुस्तक़िम की शादी का वीडीयो जारी किया था जहाँ सपा के प्रदेश अध्यक्ष अबू आज़मी साहब चहकते हुए दाऊद से हाथ मिला रहे थे और शादी में ठुमके लगा रहे थे. बाद में जब स्टार न्यूज़ के प्रतिनिधि ने इनसे फ़ोन पर बात की तो ऑन द रेकॉर्ड यह बात कुबूली की वे शादी में मौजूद थे और दाऊद को अच्छी तरह जानते हैं , उन्होने यह भी दोहराया की शादी में शरीक होना गुनाह नही है और आगे भी वे ऐसी शादियों में शामिल होते रहेंगे. बात साफ है कि आज़मी दाऊद के बूते इतना उछल रहे हैं.

आइए इन्हीं अबू आज़मी साहब के अतीत के बारे में कुछ जानते हैं

१. हिन्दी भाषियों के 'सपाई' तारणहार अबू आज़मी साहब के बारे में ९ नवंबर १९९७ के द एशियन एज में खबर लिखी है कि तत्कालीन मुंबई पोलीस कमिशनररोनाल्ड मेंडोसाने हाइ कोर्ट में दिए एफाइडेविटमें आज़मी साहब के दाऊद इब्राहिम से संबंधो के बारे में खुल कर कहा है। पूरी खबर पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें

http://www.hvk.org/articles/1197/0045.html





२. यही आज़मी साहब बीते आम चुनावों में रिश्वतखोर मतदाताओं को पैसे बाँटते हुए चुनाव आयोग के हत्थे चढ़ गये. पूरी खबर पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें.

http://www.indianexpress.com/news/abu-azmi-under-ec-scanner-for-cash-distribu/443729/



तो यह वजह है मुंबई और महाराष्ट्र के लोगों के आज़मी को तमाचा पड़ने पर खुश होने की . वो भली भाँति जानते हैं की आज़मी साहब किस खेत की मूली हैं , ९३ के दंगों में भी आज़मी साहब पर सवाल उठतेरहे हैं यह बात अलग है की सबूतों के अभाव में इनको बरी किया गया.

इन्ही मामलों से अपनी जान छुड़ाने के लिए आज़मी साहब ने यह नाटक रचा अरेबिक स्क्रिप्ट में लिखी हिन्दी शपथ पढ़ के मनसे वालों का थप्पड़ खा कर वे सस्ते में हीरो बन गए। इन्हीं आज़मी साहब के वालिद के बारे में कहा जाता है की उन्होने उत्तरप्रदेश में हिन्दी के खिलाफ उर्दू का समर्थन करते हुए आंदोलन किया था , अचानक इसी बाप के बेटे में हिन्दी के प्रति प्रेम कैसे जाग्रत हुआ? सब वोटों की राजनीति है आज़मी की नज़र महाराष्ट्र में बसे हिन्दी भाषियों के वोट पर नज़र है वहीं राज ठाकरे की मराठी वोटों पर। इन सबमें ज़रूरी मुद्दे दब गए हैं.

यह महज़ संयोग नहीं कि उत्तरप्रदेश में बर्बादी के कगार पर खड़ी सपा का नेता इस हालिया विवाद में पड़ा हो आमतौर पर समझदार नेता विवादों से दूर ही रहते हैं लेकिन आज़मी जैसे चालाक नेता विवादों से अपनी मार्केट वॅल्यू बनाते हैं , जानबूझ कर उन्होने बार बार यह ऐलान किया की वे हिन्दी में शपथ लेने वाले हैं , इधर मनसे वालों ने भी गुब्बारे को फुलाए रखने में कोई कसर छोड़ी , झूठी भाषाई अस्मिता के ज़रिए लोगों की भावनाएँ भड़का कर मनसे वालों ने चुनावों में सफलता हासिल की. यह जाहिर था की पहली बार चुन कर आए मनसे के विधायकों के पास कहने सुनने और करने के लिए कुछ खास नहीं था इसलिए अपनी मौजूदगी दर्ज़ करने के लिए सोची समझी साज़िश के तहत आज़मी से उलझ पड़े.

यक़ीनन यह पूरा नाटक मनसे और सपा द्वारा पोलिटिकल माइलएज हासिल करने के लिए खेला गया है.

आज महाराष्ट्र के मुंबई , थाणे ,पूना नासिक , नागपुर , औरंगाबाद , कोल्हापुर जैसे शहरों में ६-७ घंटे बिजली काटी जाती है , पानी सप्लाई में कटौती होती है , ज़रा सी बारिश में सड़कें स्वीमिंग पूल में तब्दील हो जाती हैं , गटर ओवरफ्लो हो कर बहने लगते हैं. फिर उचित साफ सफाई के अभाव में डेंगू , चिकुनगुनिया , मलेरिया और स्वाइन फ़्लू जैसी महामारियाँ फैलतीं हैं , दवाइयाँ नही होतीं और तिस पर लोग मरते हैं , लेकिन इतना होने पर भी सरकार को जवाबदेहि की चिंता नही होती , क्यूंकी बेवकूफ़ मतदाता ज़रूरी मुद्दों को छोड़ भाषाई अस्मिता के जंजाल में जकड़े हुए हैं. इन बेवकूफ़ मतदाताओं में यक़ीनन ज़्यादा तादात उन हिंदुओं की है जिनका सरकार द्वारा हिंदुओं को आतंकी ठहराए जाने पर खून नहीं खौलता , देवी देवताओं की अपमानजनक तस्वीरें बनाए जानेवालों के खिलाफ कहने के लिए मुँह नहीं चलता . सच है भारत की अधिकतर जनता आज भी कांग्रेस गाँधी नेहरू की मानसिक गुलामी में जी रही है , ऐसे आज़ाद भारत से तो ब्रिटिश राज अच्छा था कम से कम अराजकता या अंधेर तो न मची थी.

प्रांतवाद और क्षेत्रवाद समाज में जातिवाद से कहीं ज़्यादा ख़तरनाक है लेकिन दिक़्कत की बात यह है की . लोगों को जनता चुनती है , शायद जनता की ग़लती की यही सज़ा है कि ४ सालों तक उसके चुने हुए नेताओं को विधानसभा से निकाला गया है.

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Mohalla Live

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“कृपया प्रभाष जोशी का झूठा महिमामंडन न करें”

Posted: 10 Nov 2009 10:17 PM PST

अपने अपने पुरुष!

painting front चंडीदत्त शुक्‍ल ♦ नीले बैकग्राउंड वाले चित्र में आवरण-हीन पुरुष की पीठ है। उसमें आंखें हैं और लाल रंग से उकेरी गयीं मछलियां। ये अपनी ज़िम्मेदारियों से भागते पुरुष की चित्त-वृत्ति का पुनर्पाठ ही तो है! Read the full story »

जेल अच्‍छी फिल्‍म है

jal front अब्राहम हिंदीवाला ♦ फिल्‍म देखते समय हम जेल के अंदर की दुनिया से परिचित होते हैं। कैदी कितने असहाय होते हैं? समस्‍या यह हो गयी है कि हर फिल्‍म में हम मनोरंजन चाहते हैं। Read the full story »
आलोक श्रीवास्‍तव ♦ कोई भी शोक इतना बड़ा नहीं होता कि उसकी छाया में सत्य को दबा दिया जाए। (यदि सारा देश उसके शोक में शामिल है, तो उस देश से मेरा नाम खारिज़ कर दो : पाश)


जेल अच्‍छी फिल्‍म है

Posted: 10 Nov 2009 09:23 PM PST

अब्राहम हिंदीवाला ♦ जेल इस साल की एक महत्‍वपूर्ण फिल्‍म है। नील नितिन मुकेश, मनोज बाजपेयी और राहुल सिंह ने सपने, उम्‍मीद, हताशा और सदमे को अच्‍छी तरह व्‍यक्‍त किया है। ख़ास कर मनोज बाजपेयी अपने फॉर्म में लौटते नज़र आते हैं। इस फिल्‍म को देखते समय हम जेल के अंदर की दुनिया से परिचित होते हैं। कैदी कितने असहाय होते हैं? समस्‍या यह हो गयी है कि हर फिल्‍म में हम मनोरंजन चाहते हैं। और मनोरंजन का खास संदर्भ और मतलब हो गया है। इसके अभाव में हमें हर फिल्‍म नीरस, शुष्‍क और बेजान लगती है।


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