विनायक सेन को रिहा करो

इंसाफ़ का हर रास्‍ता बंद है

अपूर्वानंद

भारत के आदिवासी इलाकों की कहानी लूट और ध्वंस की शर्मनाक दास्तान है। राज्य सरकारों ने कंपनियों के साथ मिल कर आदिवासियों को बदलने के नाम पर इस पैमाने पर अपनी जगहों से बेदखल किया है, उसका जोड़ मिलना मुश्किल होगा। पिछले दो दशक तो और भी मुश्किल रहे हैं, क्योंकि विदेशी और देशी कंपनियों की निगाहें खनिज संपदा से भरपूर इनके इलाकों पर गड़ गयी हैं। ताज्जुब नहीं कि आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, उड़ीसा, झारखंड से लेकर केरल तक के आदिवासी बहुल क्षेत्रों में सबसे ज्यादा अशांति है। वहां सरकार की मदद से कंपनियां आदिवासियों और अन्य ग्रामीणों को बेदखल करने की कोशिश में लगी हैं और उन्हें प्रतिरोध का सामना करना पड़ रहा है। चूंकि संसदीय प्रणाली में काम करने वाले लगभग सभी दलों ने विकास के इस रास्ते पर कोई गंभीर सवाल नहीं खड़ा किया है, लूटी जा रही जनता के पास शायद हिंसक भाषा के अलावा और कोई चारा छोड़ा नहीं गया है। माआ॓वादी राजनीति के इन इलाकों में जड़ जमाने की यह बड़ी वजह है।

डॉक्टर विनायक सेन ने यह भी देखा कि सरकार माओवाद से लड़ने के नाम पर संविधान द्वारा नागरिकों को दिए सारे अधिकारों का उल्लंघन कर रही है। मुठभेड़ों के नाम पर हत्या, फर्जी मामलों में फंसा कर लोगों को जेल में डालना, लोगों को पुलिस से घेर कर कागजों पर जबरन उनके दस्तखत लेकर उनकी बेदखली छत्तीसगढ़ के लिए आम बात थी। डॉ. सेन ने एक सच्चे जनता के डॉक्टर की तरह इनकी सचाई बताना शुरू किया। उन्होंने कहा कि जिन नक्‍सलवादियों या माओवादियों को गिरफ्तार किया जाता है, उनके संवैधानिक अधिकार स्थगित नहीं हो जाते। उन्हें इंसाफ की प्रक्रिया में पूरे अधिकार के साथ शामिल होने का हक है, इसलिए बूढ़े माओवादी नेता नारायण सान्याल की गिरफ्तारी के दौरान डॉ. सेन ने उनकी सेहत की देखभाल का जिम्मा अपने ऊपर लिया।

महाराष्ट्र के खैरलांजी में 2006 में दलित परिवार की हत्या की जांच भी उन्होंने की। इसके लिए वे नागपुर गये। पुलिस ने अदालत को बताया कि डॉ. सेन दरअसल, वहां माओवादियों के प्रशिक्षण के लिए गये थे। उच्चतम न्यायालय में केंद्र सरकार के वकील ने डॉ. सेन की जमानत की अर्जी नामंजूर करने के लिए दलील देते हुए उन्हें माओवादी दल निकाय का सदस्य बताया, जो सफेद झूठ था। जो लोग यह बहस सुन रहे थे, इस झूठ पर हैरान रह गये। अदालत ने भी यह जरूरी नहीं समझा कि एक बार कागजात की ही जांच कर ली जाए। नतीजा यह है कि डॉ. सेन की ज़‍िंदगी का एक साल जेल के पीछे गुजर गया।



डॉ. सेन का मुकदमा भारतीय लोकतंत्र के लिए अहम है। क्या हम उसे उतना ही महत्व दे रहे हैं? क्या खुद उच्चतम न्यायालय को उनके मामले को दुबारा सुनना नहीं चाहिए, जब अभी खुद उसने यह कहा है कि सरकार सलवा जुडूम के नाम पर लोगों को हथियारबंद करके हत्या के लिए उकसावा नहीं दे सकती? क्या यही बात डॉ. सेन पिछले कुछ बरसों से नहीं कह रहे हैं, जिसके चलते उन पर राजद्रोही होने का आरोप लगाया गया है?

यह एक और पुरस्कार है, जिसके लिए प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति को पुरस्कृत व्यक्ति को फोन करना चाहिए और राष्ट्र की तरफ से उन्हें शुक्रिया और बधाई देनी चाहिए। लेकिन ऐसा करने के लिए उन्हें बिलासपुर जेल में फोन मिलाना होगा, क्योंकि डॉक्टर बिनायक सेन पिछले एक साल से राष्ट्र विरोधी गतिविधियों में संलग्न होने और राज्य के विरूद्ध युद्ध छेड़ने के आरोप में इस जेल में बंद हैं। डॉक्टर बिनायक सेन को 2008 का अंतरराष्ट्रीय जोनाथन मान पुरस्कार दिया गया है। यह पुरस्कार एक सौ चालीस देशों में जन स्वास्थ्य के क्षेत्र में काम करने वाली संस्थाओं और पेशेवर लोगों की सबसे बड़ी अंतरराष्ट्रीय संस्था ग्लोबल हेल्थ काउंसिल की आ॓र से दिया गया है और डॉक्टर सेन पहले दक्षिण एशियाई हैं, जिन्हें यह सम्मान मिला है। काउंसिल ने पुरस्कार की घोषणा में कहा है कि यह सम्मान डॉक्टर सेन को भारत के आदिवासियों और गरीबों की बरसों की सेवा को ध्यान में रखते हुए दिया जा रहा है, क्योंकि उन्होंने ऐसे इलाकों में स्वास्थ्य सेवाएं स्थापित करने का काम किया, जहां कुछ भी नहीं था।
डॉक्टर सेन का चुनाव एक अंतरराष्ट्रीय जूरी ने किया है, लेकिन छत्तीसगढ़ सरकार का मानना तो यह है कि डॉक्टर सेन डॉक्टर हैं ही नहीं और वे डॉक्टरी का कोई काम करते हैं, ऐसा कोई प्रमाण उनके घर से बेचारी छत्तीसगढ़ की पुलिस को नहीं मिल पाया है! यह बात डॉक्टर सेन को पिछले साल चौदह मई को गिरफ्तार करने के बाद राज्य की पुलिस की आ॓र से उनके खिलाफ दायर आरोप पत्र में कही गयी। इस तथ्य का न तो पुलिस के लिए और अदालत के लिए कोई अर्थ था कि वे पिछले तीन दशकों से दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू विश्वविघालय की अपनी नौकरी छोड़ कर छत्तीसगढ़ के ढल्ली राजहरा, धमतरी इलाके में आदिवासियों और ग्रामीणों के स्वास्थ्य के लिए काम करते रहे हैं। उन्होंने कोई नर्सिंग होम नहीं बनाया और न डॉक्टरी की फीस वसूल कर कोई कोठी बनाई, जो भारत जैसे गरीबों के मुल्क में ही डॉक्टरों के लिए संभव है।

डॉ. सेन जब आदिवासियों की जिंदगी में शामिल हुए, तो उन्होंने जाना कि इनकी बीमारी स्थायी है क्योंकि उसकी जड़ें इनकी गरीबी में छिपी है। गांव-गांव घूम कर इलाज करने के दौरान उन्होंने यह भी समझा कि इनकी गरीबी इनके पिछड़ेपन के कारण नहीं, बल्कि इस वजह से है कि अपने आपको सभ्य कहने वाले समाज ने इनके पारंपरिक संसाधनों पर कब्जा करना और उसे हड़पना शुरू कर दिया है। आदिवासियों के जंगल में रहने के हक, वहां के प्राकृतिक संसाधनों पर उनके अधिकार के मसलों को अलग करके उनके स्वास्थ्य की गारंटी करना मुमकिन नहीं। इसलिए डॉ. सेन ने इस मुद्दों पर बात करना शुरू किया।

वर्ल्ड हैल्थ काउंसिल ने प्रधानमंत्री को ख़त लिख कर कहा है कि पूरा संसार डॉ. सेन के मुक़दमे को गौर से देख रहा है। यह भी देखा जा रहा है कि ट्रायल कोर्ट ने एक अजीबोगरीब हुक्म जारी किया है कि डॉ. सेन के मुकदमे को सबके लिए खुला नहीं रखा जाएगा। उनके प्रतिनिधि को एक हफ्ता पहले अपना नाम देना होगा और वही अदालत में खड़ा हो सकेगा।

न्याय-प्रक्रिया की बुनियाद है- पारदर्शिता। अगर माओवाद का आतंक खड़ा करके सरकार इसका भी उल्लंघन करेगी, तो जनता के लिए वे यह संदेश दे रही होगी कि इंसाफ़ का हर रास्ता बंद है।

Read More

नंगी आंखों से नहीं दिखेगी यह सचाई

प्रियंकर जी,

किसी के लिखे हुए को कितना ग़लत समझा जा सकता है, आपकी टिप्पणी से पता चलता है।

पिछली टिप्पणियों में आपने जो सवाल पूछे थे, उनका जवाब मैं अपने लेख में दे चुका हूं। उससे ज़्यादा कहने को कुछ बचता नहीं है। अपवित्र आख्यान से वैचारिक खुराक लेने वाले के लिए आधा गांव अपरिचित नहीं होगा, आप शायद जानते हों। मैं बार-बार समझदारी भरे विज़न की बात ही उठा रहा हूं, आप इस विज़न के नज़दीक पहुंचने की कोशिश तो करके देखिए। मैंने पहले भी कहा है कि भाषा की राजनीति बहुत सूक्ष्म विषय है और नंगी आंखों से इसे देखना संभव नहीं। आपने इस टिप्पणी में जो सवाल किए हैं, उनका मेरे लेख में भी जवाब है, अगर आप देख पाएं तो। कुछ बातें यहां और हैं।

निरुद्देश्य ज्ञान झाड़ऩा मेरा मक़सद नहीं है। सूफि़यों पर बात आपके बताए कालखंड के भी पीछे जाकर शुरू हो सकती है, रूमी-फ़‍िरदौसी को लेते हुए, शंकर के अद्वैत और रामानुज के विशिष्ट अद्वैत को छूते हुए। पर मैंने जो मुद्दा उठाया है, उससे इनका कोई स्पष्ट संबंध नहीं है। 1925 की बात औपनिवेशिक समय से मुखर हुई राजनीति बताने के लिए है।

पंजाब प्रवास अल्प हो या दीर्घ, इस सवाल का कोई मतलब नहीं। सेखों, पूरन सिंह के योगदान पर कोई सवाल नहीं उठाया मैंने, सिर्फ़ यह जानना चाहा है कि सूफि़यों के योगदान पर मौन धारते हुए इन्होंने लैंग्वेज डिस्कोर्स को सिखिज़्म की ओर क्यों मोड़ दिया? जो कि संभवत: आपकी समझ में नहीं आया।

जालंधरीपाद का जि़क्र इस राजनीति की सूक्ष्म कार्यशैली को दिखाने के लिए किया गया है। कोई दलित, महिला विमर्श नहीं। वैसे, हिडन एंड साइलेंट कॉन्सपिरेसीज़ को समझने की कोशिश करेंगे, तो पाएंगे कि सारे मुद्दे गहरे कहीं न कहीं जुड़े हुए हैं।

इस बात से कौन इनकार कर सकता है कि ये कवि पंजाब की सांझी विरासत के प्रतिनिधि हैं। नामवर और पातर ने भी लिखा। लेकिन पंजाबी में भाषा पर काम करने वालों ने इन सूफ़ी कवियों को एक समय तक उपेक्षित किया, यह तो तथ्य है, जो मैंने वहां भी बताया है। इसे हिंदी की आंख से नहीं, पंजाबी की आंख से देखना होगा।

लेखक अपने इतिहास, वर्तमान और भविष्य की सच्ची तस्वीरें देता है। मैंने पहले भी कहा है कि जिसे आप अतिरंजना मान रहे हैं, वह मिनिएचर मात्र है। जिन्हें आप नया भय मान रहे हैं, वे पुरानी आशंकाएं हैं। पुरानी आशंकाओं को समझे बिना नये को नहीं समझ पाएंगे।

आपकी रिजिडिटी बार-बार आपको उसी ताब पर पुराना सवाल उठाने के लिए बेचैन करेगी, जिसका जवाब मैं दे चुका हूं। इससे ज़्यादा और इससे सरल शब्दों में किसी मुद्दे की स्पूनफीडिंग संभव नहीं।

माफ़ करेंगे, अग्रज हैं आप, लेकिन आपकी टिप्पणी, भाषा और तेवर यह एहसास कराते हैं कि भाषाई राजनीति की सूक्ष्मता को पकड़ते-पकड़ते आप फिसल जा रहे हैं। यह ख़ामोश राजनीति बहुत बारीक होती है, इसे समझना होगा। इस पर बात करते समय लेखकीय समझ और चेतना जितनी ज़रूरी है, उससे कहीं ज़्यादा अनुपात में पाठकीय समझ और चेतना। पाठकीय समझ अगर मद्धिम हो, तो किसी भी रचना को, किसी भी तरह डीकोड करके, किसी भी अनजानी घातक दिशा में भेज सकती है, जैसा कि इस मुद्दे पर हो रहा है।

ऐसे में मूल बातें गुम होकर अनर्गल वितंडे पैदा हो जाते हैं। ऐसे में हम रोशनी के मूल में पहुंचने के बजाय पेरीफेरियल इंसेक्ट्स में तब्दील हो जाते हैं, जो दीये के चारों ओर भटकने को अभिशप्त रहते हैं।

विचारों से हट कर अनर्गल बातें, लेखकों-पत्रकारों के बारे में पूर्वाग्रह, तेज़ी-तुर्शी, ‘सुधर जाओ, संभल जाओ, उत्साह घटाओ, उत्साह बढ़ाओ’ की ललकार और अपील उतनी ही हो, जिससे भाषाई राजनीति का यह बारीक किंतु बड़ा मुद्दा किसी सार्थक जगह पर पहुंचने के बजाय ‘गीत चतुर्वेदी बनाम प्रियंकर पालीवाल टी-20 मैच’ न बन जाए। उम्मीद है, आप भी ऐसा नहीं चाहते होंगे।

ढेर सारी शुभकामनाएं।

Read More

इल्मों बस करीं ओ यार!

प्रिय अविनाश,
मेरी टिप्पणी पर तुम्हारा बनाया शीर्षक (अपुष्ट प्रमाणों और पुष्ट उत्साह छोड़ो गीत चतुर्वेदी!) भड़कीला, कमजोर और गैरज़रूरी है। यहां तक कि व्याकरणिक दृष्टि से ग़लत भी। कम से कम ‘प्रमाणों’ को एकवचन कर ‘प्रमाण’ तो कर देते। मुझे लगता है शीर्षक होना चाहिए बुल्ले शाह की काफ़ी की पहली पंक्ति : इल्मों बस करीं ओ यार! मेरा यह भी मानना है कि ज्यादा ज्ञान और शोध से कूड़ा हाथ लगता है। अच्छा हो कि मेरे लिखे पर मेरी पसंद का शीर्षक जाए। बाकी सामान्य है।
स्नेह के साथ,
प्रियंकर

प्रिय गीत,

टीपन लेकर घुमत प्रियंकर!

कोई फायदा नहीं है। कुछ लोग इसे इतना नाटकीय समझ लेंगे कि इसका नाट्य रूपांतरण कर चांदनी चौक खाली करा कर वहां ड्रामा खेलेंगे।

कल मैं बोधिसत्व जी के ब्लॉग पर गया तो उनके साहित्यकार ब्लोगर आलेख पर कई टिप्पणियां थीं। लेकिन एक टिप्पणी पर नज़र ठहर गयी। प्रियंकर जी ने लिखा कि वह अभी-अभी कहीं से एक टिप्पणी कर के आ रहे हैं और यहां भी वही टिप्पणी करेंगे। उस टिप्पणी में उन्होंने बर्तोल्ट ब्रेख्त की एक कविता उद्धृत की, जिससे प्रियंकर जी के हांफने की आवाज़ सुनाई दे रही थी। यह टिप्पणी जगह-जगह चेंपने के लिए लगता है कि वह भागे-भागे फ़िर रहे थे।

घबरा कर मैं एक चाट-पकौड़े बनाने की विधि सिखाने वाले एक ब्लॉग पर गया। गनीमत थी कि वह टिप्पणी वहां नहीं थी। घूमते-घूमते जब मैं मोहल्ले में पहुंचा, तो देखता क्या हूँ कि वह टिप्पणी यहां भी चिपकी हुई है। जिस लेख पर उन्होंने टिप्पणी की थी वह किन्हीं विजयशंकर जी का था।

लेख पढ़ कर समझ में यही आया कि वह पाठकों के ख़िलाफ़ तो कुछ नहीं कर रहे हैं बल्कि पाठकों की भागीदारी की बात कर रहे हैं क्योंकि भाषा और साहित्य का मामला दुतरफा होता है। अगर साहित्यकार अपनी ही होशियारी करता रहे और पाठक उस पर कुछ न कहें, तो मामला इकतरफा हो जाता है। इसका मतलब प्रियंकर जी ब्रेख्त की वह कविता रट्टा मारकर यूज कर रहे हैं। समझे नहीं। बोधिसत्व जी के लेख पर भी उस कविता को इस्तेमाल करने का मतलब समझ में नहीं आया।

लेखकों पत्रकारों द्वारा भाषा का मुद्दा उठाये जाने पर भी वह बेतरह चिढे हुए हैं। अरे भाई, अगर लेखक-पत्रकार यह मुद्दा उठाते हैं तो उन्हें क्या आपत्ति है? तो क्या प्रियंकर जी चाहते हैं कि यह मुद्दा उठाने का एकाधिकार राजनेताओं के पास हो? ऐसे में समझा जा सकता है कि उनका भाषा प्रेम क्या है, जिसकी वह बार-बार दुहाए देते फिरते हैं।

किसी ने सच ही कहा है कि हार कर भागते हुए सैनिक तथा हाथी अपनी ही सेना को मारते-काटते और कुचलते चले जाते हैं। अब इस बात पर मैं ब्रेख्त की पंक्तियां जाया नहीं करूगा।

घटोत्कच

कलियुगी घटोत्कच से तो क्या कहूं (मैं उन्हें जानता हूं और उनकी इस योजना को भी कि वे सिर्फ़ मुझे उत्तेजित करना चाह्ते हैं! अगर हो जाऊं तो उनकी बन आएगी!), हां! तुमसे लंबी बात करने का मन है, जो लुम्पेनों की उपस्थिति में फिलहाल संभव दिखाई नहीं देती। तब भी संक्षेप में कुछ...

1. दोनों ही स्थितियां ख़तरनाक हैं। पनचक्की को राक्षस समझना भी और राक्षस को पनचक्की समझना भी।

2. तुम्हें अपनी वैचारिक खुराक ‘अपवित्र आख्यान’ से मिली और मुझे ‘आधा गांव’ से। शायद इसीलिए मुझे अनुसंधानरत अध्येताओं से आधा गांव के ‘फ़ुन्नन मियां’ ज्यादा प्रेरक चरित्र लगते हैं। पढा-लिखा ज्ञानी तोता होने से कुछ नहीं होता। बात समझदारी भरे विज़न की होती है। अपने किये/लिखे के असर की भी।

3. सामाजिक इतिहास को समझे बिना साहित्यिक इतिहास पर मगज़मारी करने वाले शोधार्थी अक्सर पूर्वनिर्धारित किंतु अटपटे निर्णयों तक पहुंचते हैं।

4. जिस राजनीति की शुरुआत तुम्हें 1925 से दिख रही है, नासमझी या अतिरंजना के बीज वहीं हैं। सूफियों पर बात करते हुए तुम्हें उनके इतिहास की तफ़सील में और पीछे जाना चाहिए। सूफ़ियों के कई सिलसिले हैं - लगभग बारह। लेकिन चार अहम हैं :
अ) चिश्तिया
ब) कादरिया
स) सुहरावर्दी
द) नक्शबंदी
पंजाब के अधिकांश (लगभग सभी) सूफी शायर चिश्ती और कादरी सिलसिले से जुड़े रहे। कादरिया सिलसिले में मुगल बादशाह शाहजहां और दारा शिकोह की उदारवादी नीति का मूल भाव देखने को मिलता है। किंतु औरंगज़ेब के गद्दीनशीं होते ही, जिसका झुकाव कट्टरपंथी नक्शबंदी सिलसिले की ओर था, कादरिया सूफ़ियों पर अत्याचार और उत्पीड़न का सिलसिला शुरू हो गया। तो उनके उत्पीड़न की जड़ें यहां हैं, जिसे तमाम गंभीर शोध के बावजूद गीत के भीतर का शोधार्थी देख नहीं देख पाया। और कादरिया सूफ़ियों के इस उत्पीड़न का कारण उनकी यह खूबी थी कि उन्होंने ‘एक विदेशी धर्म (इस्लाम) और पंजाब की देसी पहचान में सकारात्मक संवाद की मानवीय संभावना को जन्म दिया।’

4. तुम बहुत परिश्रमी पत्रकार हो। पर अपने अल्प पंजाब-प्रवास में ही पंजाबी भाषा-साहित्य की अंदरूनी तीन-तिकड़मों में भीतर प्रवेश कर उन पर इतना भरोसा क्या काबिल-ए-तारीफ़ काम है? इसे तो स्वीकार करना ही होगा कि तमाम अंतर्विरोधों के बावजूद प्रो. पूरन सिंह और संत सिंह सेखों ने पंजाबी साहित्य के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण और बुनियादी काम किया है।

5. जालंधरीपाद और पीरो प्रेम्मण के बारे में मैंने कोई टिप्पणी नहीं की, सो मुझे उनके बारे में कुछ नहीं कहना है। यह अलग ज़मीन पर हो रही बहस को बिलावजह दलितवाद और नारीवाद के खांचे में धकेलना है। इन पर अलग से लिखो, तमाम विमर्श एक लेख में करने के मोह से बचते हुए, तब बात करेंगे।

6. मेरी आपत्ति अब भी वही है कि लेख सुनी-सुनाई बातों पर - हीयरसे - पर आधारित है। वैसी ही जनश्रुतियां, जिन्हें उस ज़मीन से नावाकिफ़ नया पहुंचा परदेशी चटखारे लेकर सुनता है और कहीं पत्रकार-लेखक हुआ तो उसकी परिकल्पनाएं उड़ान भरने लगती हैं और वह सिद्धांत गढने लगता है। इस तरह शक के माहौल में और जहर घोलता है। ‘अलिखित कानाफूसियां भी हुईं’ यह लिखने से स्रोतों का कुछ तो खुलासा होता ही है।

7. यह फ़तवा बहुत रोचक है कि ‘सूफियों के सभी पैरोकार सरहद पार चले गए’। ‘जो कुछ बचा है सरहद पार ही बचा है’,यह दृष्टि भी भेंगी दृष्टि है। ऐसा प्रतीत होता है, मानो इधर के पंजाब ने तो सूफ़ी-साहित्य को देशनिकाला ही दे दिया है। अनुरोध है कि मदन गोपाल सिंह जैसे सूफी साहित्य के विशेषज्ञों से थोड़ी-बहुत अंतर्क्रिया करने के पश्चात ही पुष्ट धारणाएं बनाएं और तब उनका प्रकीर्णन करें।

8. तुमने बहुत सही लिखा है कि ‘ये चालाक लोगों द्वारा संचालित ऐसा लंपट समय है कि कोई दोन किहोते चार क़दम चल ही नहीं सकता।’ किंतु हर लंपट समय में हर चालाक आदमी को दो-चार ‘दोन किहोते’ चाहिए होते हैं।

9. पिछले कुछ दिनों से ‘नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ़ पंजाब स्टडीज़, नई दिल्ली’ द्वारा प्रकाशित बुल्ले शाह की काफ़ियां, वारिस शाह का हीर, फ़ज़ल शाह का किस्सा सोहणी-महींवाल और बाबा फ़रीद के संकलन पढ रहा था, जिसमें संपादक के रूप में नामवर जी का शानदार सम्पादकीय है जिसमें उन्होंने ‘पंजाब की सांझी विरासत का स्वागत’ किया है और लिखा है कि ‘पंजाब भारत का बड़ा दिल है’। सुरजीत पातर और कुलजीत शैली जैसे पंजाबी के लेखकों, विद्वानों ने परिचय लिखे हैं।

सुरजीत पातर का ‘वारिस शाह का परिचय’ तो मन में हिलोरें उठा देता है। और वह एकत्व खोजने वाली समावेशी दृष्टि भी दिखती है जो पंजाबियत को परिभाषित करती आयी है। ऐसे में यह लेख देखने में आया, जो अपुष्ट प्रमाणों और पुष्ट उत्साह से पुनर्बलित नाटकीय शैली और विभेदकारी दृष्टि से लिखा गया है।

पंजाबी साहित्य से सिर्फ़ रस्मी रिश्ता न रखने वाले गम्भीर पाठकों को ‘नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ़ पंजाब स्टडीज़,नई दिल्ली’ द्वारा प्रकाशित इन संकलनों को ज़रूर पढ़ना चाहिए।

10. और उसी ताब पर एक बार पुनः यह कहने का मन है कि ऐसा कौन माई का लाल है जो बुल्ले शाह, वारिस शाह, फ़ज़ल शाह, शेख फ़रीद, गुलाम फ़रीद, मियां शाह, शाह हुसैन, सुलतान बाहू, शाह अशरफ़, अली हैदर, फ़रद फ़कीर, शाह मुराद, हाशिम शाह, गुलाम जीलानी रोहतकी, मौलवी गुलाम रसूल और लभ्भू शाह आदि को पंजाबी साहित्य से निकाल सके?

11. लेखक का काम ‘खेद से खिन्न की’ यात्राओं को रोकना होना चाहिए। अतिरंजित लेखन से नये भय, नयी आशंकाएं पैदा करना नहीं। अपुष्ट कानाफ़ूसियों के आधार पर तो कतई नहीं।

12. और क्या कहूं? बुल्ले शाह के शब्दों में ही कहूंगा : ‘इल्मों बस करीं ओ यार’
स्नेह सहित,
प्रियंकर

(पुनश्च : संदर्भित सीरीज़ में नामवर जी का संपादकीय बहुत शानदार है,उसे ब्लॉग पर जल्दी देने की कोशिश करूंगा : प्रियंकर)

Read More
blogvani   चिट्ठाजगत