Mohalla Live

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उदय जी… यह व्यक्तिगत क्या होता है?

Posted: 15 Jul 2009 12:56 PM PDT

अशोक कुमार पाण्डेय कई दिनों से बड़े दुखी मन से देख रहा था यह सब… आज रहा नही गया। यह व्यक्तिगत क्या होता है? उदय जी आपको दिवंगत कुंवर साहब के प्रति पूरा आदर रखने की आजादी है पर उसके लिए सार्वजनिक समारोह में एक हत्यारे के साथ बैठना? इन व्यक्तिगतों से लड़कर ही लेखक विचार की राह पर आगे बढ़ता है। आप आज अपने ख़िलाफ़ बोलने वालों को जातिवादी कह रहे हैं। बहुत विनम्रता से बता दूँ किजिस कालेज में आपके दिवंगत अग्रज पढाते थे वह उसी गोरखनाथ मन्दिर द्वारा संचालित ...


बिकाऊ मीडिया से पर्दा उठाने के लिए थैंक यू आम चुनाव!

Posted: 15 Jul 2009 12:26 PM PDT

किसी बिजनेस में केवल वही आचार संहिता काम करती है, जो बिजनेस को मुनाफे की ओर ले जाए। मिलावट को रोकने का कोई भी नियम मुनाफे के ख़‍िलाफ़ होगा, इसलिए इससे विशेष फायदा नहीं होगा। कुछ और प्रतिक्रियाएं...


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फ्रांस में फिर अपमान ...जवाब दे सरकार EXCLUSIVE

जबाब दे .......फ्रांस सरकार ...जवाब दे ,शायद कुछ ऐसे ही शब्द आपको न्यूज़ चैनल में देखने को ना मिले,क्योंकि यह हिन्दुस्तान है...इसका एक शर्मनाक उदाहरण नीचे पेश है ,अगर यह देखने के बाद भी आपको कोई असर नहीं पड़ता तो आप उस भीड़ के हिस्से है जो पहला भारतीय होने के बजाय सेकेण्ड हेंड अमेरिका होना ज्यादा पसंद करते है ..


यह वाक्या है ..14 जुलाई को फ्रांस में नेशनल डे परेड का जहा रिहर्सल के दौरान फ्रांसीसी सेना के एक जवान ने भारतीय झंडे के एक कोने को अपने बूट के तले दबा रखा है। ,सवाल यह उठता है की एक झंडा एक राष्ट्र के स्वाभिमान का प्रतीक होता है ....

और ऐसी सूरत में भारतीय ध्वज को विदेशी धरती पर इस तरीके से अपमान करते हुए भी अगर आपका स्वाभिमान नहीं जागता है ..तो ज़रा सोचिये
ASHISH JAIN-अपनी राय जरुर दे ..

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मायावती ठीक ही तो कर रही है!

उत्तर प्रदेश में सरकारी धन से मायावती की प्रतिमाएं बनाने में देशभर में हाहाकार मचा है। मायावती को अपनी प्रतिमाएं बनाने से रोकने के मामले में अब ऑनलाइन देशव्यापी अभियान भी शुरू किया गया है। इस अभियान को लोग समर्थन भी दे रहे हैं। www.ipetitions.com/petition/mayawaticase वेबसाइट पर लोग इस मामले पर अपने विचार रख रहे हैं। ये वेबसाइट एक ऑनलाइन याचिका है। मायावती लगभग 2500 करोड़ रुपये के सरकारी धन से इन पार्कों का निर्माण कर रही है।

अगर जनता के धन के बात न होती मैं तो मायावती के मूर्तियां लगवाने के कदम का समर्थन करता। इसकी एक वजह है। मूर्तियां लगवाने के पीछे सुश्री मायावती तर्क देती हैं कि स्वर्गीय कांशीराम जी ने ही उन्हें कहा था कि मूर्ति बनवाएं। 'मनुवादी' विचारधारा के लोग मायावती की इस बात पर यकीन नहीं कर रहे। मायावती बेचारी सही ही तो कर रही है। एक नेता की आखिरी इच्छा का वो सम्मान कर रही हैं और आप उन्हें रोक रहे हैं? हा हा हा हा हा हा....।

जी नहीं, वजह ये नहीं कुछ और है, इस वजह का खुलासा बाद में करता हूं पहले मायावती की बात कर लूं। दरअसल कांशीराम जी ने मायावती से कहा होगा- मैं चाहता हूं कि देश भर में तुम्हारी मूर्तियां लगे, लोग तुम्हें देवी की तरह पूजें। जी हां, मायावती भी यही कहती फिरती हैं कि कांशीराम जी ने उन्हें ऐसा कहा था। लेकिन मायावती ने इसे कुछ और ही समझ लिया। दरअसल कांशीराम जी के उपरोक्त कथन का अर्थ था कि तुम दलितों के उद्धार और विकास के लिए इतना करो कि उन्हें समाज में बराबर सम्मान मिले। उन्हें अच्छी स्थिती में लाकर खड़ा कर दे। तुम्हें लोग आदर्श मानें, देवी स्वरूप मानें... जगह-जगह तुम्हारी मूर्तियां लगाएं और तुम्हारी पूजा की जाए। मायावती जी ने इसे कुछ और ही समझ लिया और लग गई खुद की ही मूर्तियां बनवाने। ये सरासर बेवकूफी नहीं तो क्या है? मैं उत्तर प्रदेश में प्रसारित होने वाले एक समाचार चैनल में कार्यरत हूं। यूपी की दशा और दिशा से भली भांति अवगत हूं। अरे कई इलाके तो ऐसे हैं मेरे दोस्तो जहां दलित लोगों के पास रहने को घर, पहनने को कपड़े औऱ खाने को रोटी नहीं। यकीन मानिए लोग चूहे खाने को विवश हैं। इस वजह से वो कई बीमारियों सें ग्रस्त हैं। 2500 करोड़ रुपये से उनके के लिए क्या-क्या किया जा सकता था। लेकिन देखो क्या किया जा रहा है? ये धन की बर्बादी नहीं तो क्या है? मायावती राहुल गांधी और यहां तक महात्मा गांधी को भी नाटकबाज़ बताती हैं। कहती हैं कि दलितों के घर रहने और खाने से कुछ नहीं होता। ये सब नाटक है, अरे भैया तो फिर मूर्ति लगवाने से होता है क्या? मायावती ने ऐसा कौन सा काम कर दिया कि उसकी मूर्ति लगवाई जाए। मायावती को जिस तबके ने सत्ता सुख दिया है कल वही उसकी दुर्गति भी करेगा। सद्दाम हुसैन ने भी अपनी बड़ी-बड़ी मूर्तियां लगवाई थी, तख्त बदला था तो जनता ने उन बुत्तों पर जूतों की बरसात की थी। अब जब मूर्तियां बन गई हैं, धन फुंक गया है तो इन मूर्तियों को हटाओ मत। लगे रहने दो वैसे ही.. जिनके नाम की राजनीति कर मायावती ये ओछी हरकतें कर रही है कल वही लोग इन मूर्तियों की खातिरदारी करेंगे। साथ में आने वाली पीढ़ियां भी याद रखेंगी कि भारतवर्ष में एक ऐसा "महान" नेता भी हुआ है जो खुद अपनी मूर्ति लगवा गया...

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बेजमीर पत्रकारों को कुरबान अली की सलाह

सलीम अख्तर सिद्दीक़ी
11 जुलाई को उदयन शर्मा के जन्म दिन पर दिल्ली के कांस्टीट्यूशन क्लब के डिप्टी स्पीकर हॉल में एक परिचर्चा 'लोकसभा के चुनाव और मीडिया को सबक' विषय पर आयोजित की गयी थी। परिचर्चा का आयोजन करने वाले, वक्ता और श्रोता मीडिया से ही जुड़े लोग थे। परिचर्चा में मीडिया को कसौटी पर कसने की कोशिश की गयी । परिचर्चा में प्रभाष जोशी के उन इल्ज+ामात को विस्तार मिला जिनमें उन्होंने कहा था कि हालिया लोकसभा चुनाव में अखबारों ने पैसे लेकर प्रत्याशियों के फेवर में खबरें छापी हैं। हालांकि परिचर्चा में किसी भी वक्ता ने इतनी हिम्मत नहीं दिखाई कि उन मीडिया हाउस के नाम लें, जिन्होंने पैसे लेकर खबरें छापने जैसा घिनावना काम किया था। बी4एम के यशवंत सिंह ने जरुर दैनिक जागरण और दैनिक भास्कर का नाम लेकर कहा कि इन दोनों अखबारों ने खुले आम ये काम किया।
परिचर्चा के शुरु में मुख्य अतिथि केन्द्रीय मानव संसाधन मंत्री कपित सिब्बल ने अपने सम्बोधन में यह कहा कि मीडिया के कुछ छापने अथवा छापने से कुछ फर्क नहीं पड़ता है। कपिल सिब्बल की इस बात का किसी पत्रकार ने विरोध नहीं किया। उनके जाने के बाद कुरबान अली ने जरुर यह कहकर अपनी भड़ास निकाली कि 'आज कपिल सिब्बल सबके मुंह पर तमांचा मार कर चला गया और हम कुछ नहीं कह सके'
पंकज पचौरी का कहना था कि 'केवल 100रु महीना में न्यूज चैनल और दो रुपए में अखबार खरीदोगे तो वही मिलेगा, जो अब मिल रहा है। स्तरीय खबरों के लिए कम से कम दस से पन्द्रह रुपए और चैनल के लिए 1000 रुपए खर्च करने पड़ेंगे।' क्या पंकज पचौरी को यह नहीं मालूम की देश की सत्तर फीसदी जनता केवल 20 रुपए रोजाना पर गुजर-बसर करती है। ऐसे में कौन् खबरों के लिए इतना पैसा खर्च करेगा। यहां यह कहा जा सकता है कि मोटी सेलरी लेने वाले पत्रकार ही क्यों नहीं अपनी सेलरीकम कर लेते या मीडिया हाउस अपना प्रोफिट कम कर लेते। चलिए मान लिया कि दर्र्शक और पाठक ज्यादा पैसे खर्च भी करे तो इस बात की क्या गारंटी है कि ज्यादा पैसे लेने के बाद भी पैसे लेकर खबरें नहीं छापी जाएंगी।
विनोद अग्निहोत्री ने बताया कि 2004 के चुनाव से ही खबरों के पैकेज बेचे जा रहे हैं। उन्होंने उदाहरण देकर बताया कि 2004 में मेरठ से जद यू के प्रत्याशी केसी त्यागी ने उन्हें बताया था कि मेरठ के अखबारों ने उनसे पैकेज खरीदने की पेशकश की थी। सीमा मुस्तफा ने बहुत साहस के साथ कहा कि हम पत्रकार डरे हुए और सहमे हुए हैं। बड़े से बड़े सम्पादक को भी पता नहीं होता कि कब मालिक की तरफ से आदेश आ जाएगा कि आपकी सेवाएं समाप्त की जा रही हैं। नौकरी सलामत रहे इसीलिए वे सब काम कर रहे हैं, जो नहीं करने चाहिएं। अलका सक्सेना ने कहा कि पैसे को मैनेज करने वाले नाकाबिल पत्रकार वहां हैं, जहां एक पत्रकार की हैसियत से उन्हें नहीं होना चाहिए और अच्छे पत्रकार हाशिए पर हैं।
परिचर्चा 1947-1977 की पत्रकारिता और 2009 की पत्रकारिता की बहस में भी उलझी। कुलदीप नैयर ने 1977 की पत्रकारिता को याद किया। इस पर आशुतोष का कहना था कि 1977 की पत्रकारिता 2009 में नहीं की जा सकती। उन्होंने यह भी कहा कि 1977 में भी यही होता था, जो आज हो रहा है। इस पर कुरबान अली ने उन्हें टोका कि 1977 में ऐसा नहीं होता था। इस पर आशुतोष नाराज हुए और माइक छोड़कर जाने लगे। संचालन कर रहे राहुल देव ने उन्हें रोका। लेकिन आशुतोष पर टीका टिप्पणी जारी रही तो आशुतोष को बीच में ही बात खत्म करके बैठना पड़ा।
आशुतोष शायद नहीं जानते कि 1977 में एम जे अकबर, एसपी सिंह, और उदयन शर्मा ने जिस पत्रकारिता की नींव डाली थी, उसी नींव पर आज की यानि 2009 की हिन्दी पत्रकारिता का महल खड़ा है। मीडिया को बेचने वाले उस नींव को हिलाने की कोशिश कर रहे हैं। कुरबान अली ने सही कहा था कि 1977 में पत्रकारिता करने वाले लोगों के सामने किसी कपिल सिब्बल की यह कहने की हिम्मत नहीं हो सकती थी कि तुम लोगों के छापने या नहीं छापने से कुछ नहीं होता। आज कपिल सिब्बल जैसे लोगों को पता है कि जमीर बेचने वालों का दिल भी कमजोर हो जाता है। यदि किसी को मौत से डर लगता तो उसे कोई हक नहीं है कि वह फौज की नौकरी करे। कुरबान अली ने सलाह दी कि 'पत्रकारिता के नाम पर पैसा बनाने से तो अच्छा दुनिया का सबसे प्राचीन धंधा है।
अपने अध्यक्ष्ीय भाषण में शरद यादव ने क्या कहा, किसी को समझ नहीं आया। परिचर्चा के बाद जलपान के समय प्रसिद्व हास्य कवि सुरेन्द्र शर्मा ने चुटकी ली कि 'सबसे अच्छा शरद यादव बोला, यही नहीं पता की क्या बोला।' उनकी इस चुटकी पर उनके पास खड़े लोग हंसे बिना नहीं रह सके।
इसमें दो राय नहीं कि मीडिया पर कॉरपोरेट जगत का कब्जा है। खबरें सम्पादक के विवेक से नहीं, बाजार की मांग के आधार पर तय होती हैं। यह निष्कर्ष नया नहीं है। यह सब जानते हैं कि कॉरपोरेट जगत समाज सेवा के लिए अखबार, मैंगजीन या न्यूज चैनल नहीं चलाता। मुनाफा उनकी पहली शर्त है। मुनाफा भी कम नहीं भरपूर चाहिए। इसके लिए चाहे मीडिया खबरों को विज्ञापन बनाकर छापे, नंगी तस्वीरें दिखाए, आरुषी जैसी मासूम लड़की का चीरहरण करे या सच्ची कहानियां जैसी पत्रिकाओं की तरह अपराध, सैक्स और अन्धविश्वास को बेचे। कुछ भी करें बस अखबारों का प्रसार बढ़े और न्यूज चैनल की टीआरपी। समाज भाड़ में जाए या पत्रकारिता का बेड़ा गर्क हो या पत्रकार दल्ला बनकर रह जाए। सामाजिक सरोकार आज के मीडिया के एजेण्डे से गायब हो चुके हैं।
परिचर्चा में कुलदीप नैयर, कुरबान अली, संतोष भारतीय, आशुतोष, पंकज पचौरी, राहुल देव, अलका सक्सेना, हिसाम सिद्दीकी, नीलाभ, विनोद अग्निहोत्री, यशवंत सिंह, पुण्यप्रसून वाजपेयी, शेष नारायण सिंह और अविनाश जैसे नाम, जो किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं, सहित मीडिया जगत की महान हस्तियां भी मौजूद थीं। वेब पत्रकारिता और ब्लॉगिंग से जुड़े लोग भी काफी संख्या में मौजूद थे। मैं 2003 से प्रत्येक 11 जुलाई को दिल्ली जाता रहा हूं। इस बार से ज्यादा मीडिया के लोग कभी इस अवसर पर मौजूद नहीं रहे। संचालन कर रहे राहुल देव ने भी इस बात को कहा कि इस बार उपस्थिति बहुत ज्यादा है। बहुत से लोगों को बैठने का स्थान तक नहीं मिला। स्थान नहीं मिलने का किसी को कोई गिला कोई शिकवा नहीं था। निर्धारित समय से एक घंटे से ज्यादा चली परिचर्चा को बहुत सारे लोगों ने खड़े-खड़े ही सुना। समय के अभाव में कई लोग अपने विचार भी नहीं रख सके। ये उपस्थित लोगों का उदयन शर्मा के प्रति प्यार तो दर्शाता ही है, यह भी बताता है कि परिचर्चा का विषय कितना गम्भीर था।

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अशोक का नरक

अशोक प्राचीन भारतीय इतिहास का महान शासक था. यहाँ पर मैं उसके काल की ऐसी घटना का उल्लेख करूंगा जिसका पता सभी को नहीं है. पटना के पास अशोक ने एक यातना घर बनवाया था. जहाँ पर वह अपने विरोधियों को क़ैद करके रखता था और वहां उनको तरह तरह की यातनाएं दी जाती थीं. अशोक की म्रत्यु के बाद भारत की यात्रा करने वाले चीनी यात्री युआंग चुआंग ने एक बड़ा स्तम्भ देखा था जिसके बारे में प्रसिद्धि थी के यह उस स्थान पर हैजहाँ कभी अशोक का नरक था जिसमे मनुष्यों को यातनाएं देने के यंत्रों की कल्पना की गयी थी. चीनी यात्री एक अनुश्रुति का उल्लेख करता हैकि अशोक को एक जैन अर्हन्त ऐसा मिला जिसे किसी प्रकार की यातना का कष्ट न हुआ. इससे अशोक को अपने पाप का ज्ञान हुआ . उसने नरक को गिरवा दिया और दंड विधान उदार किये.फाह्यान नमक एक और चीनी यात्री ने भी अशोक के नरक का वर्णन किया है .

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ये हिंदी पत्रकारिता का शोककाल है!!!

Posted: 14 Jul 2009 01:37 PM PDT

ख़बरों में मिलावट पर बहस की इस दूसरी खेप में पेश है कुछ और युवा पत्रकारों की राय।


ये सूरत बदलनी चाहिए…

Posted: 14 Jul 2009 12:41 PM PDT

(मुझे खुशी है कि मैं गलत साबित हुआ। हिंदी में गलत को गलत कहने वाले वीरों की कोई कमी नहीं है। इसका सबसे बड़ा प्रमाण नीचे का विरोधपत्र है। हिंदी के 50 से ज्यादा महत्वपूर्ण लेखकों ने योगी आदित्यनाथ के हाथों सम्मानित होने के लिए उदयप्रकाश की निंदा की है। नीचे हस्ताक्षर करने वाले कुछ लेखकों ने सक्रियता दिखाते हुए बाकी लेखकों से टेलीफोन पर विरोधपत्र जारी करने पर सहमति ली है। क्या उदय प्रकाश अब भी कहेंगे कि उनकी आलोचना जातिवादी फासीवादियों की साजिश का नतीजा है: पंकज श्रीवास्‍तव, ...


साथियो, ये निवेदन प्रार्थना के शिल्‍प में नहीं है!

Posted: 14 Jul 2009 09:15 AM PDT

निरंजन श्रोत्रिय यह सब ग़लत हो रहा है। अब हिंदी साहित्य उस निम्न स्‍तर तक आ पहुंचा है, जब लेखक के हगने, मूतने, खांसने से उसकी प्रतिबद्धता तय की जा रही है। जो लोग बात का बतंगड़ बना रहे हैं, उन्हें इतना तो सोचना चाहिए था की क्या उदय दंगाइयों के पक्ष में खड़ा कोई छद्म लेखक है? जो कवि जनसत्ता में गुजरात विभीषिका पर ध्रुपद जैसी अद्भुत और मार्मिक कविता लिख रहा हो, उसके बारे में ऐसे शक कई दूसरे शक पैदा करते हैं। जो लोग उदय और अशोक वाजपेयी ...


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पुलिस की लापरवाही से लटकते हैं मामले...


बैतूल ज़िले के आमला थाने में दलित महिला के साथ पुलिसकर्मियों द्वारा बलात्कार किए जाने का मामला 04 जून को अखबारों की सुर्खियों में आया था। जिसके बाद राज्य महिला आयोग ने भी इस मामले में तुरन्त ही जाँच शुरू की। आयोग की दो सदस्य पीड़िता से मिलने बैतूल जिला जेल पहुँची। कई संगठनों ने घटना का विरोध किया लेकिन इस घटना को तकरीबन डेढ़ माह बीत जाने के बाद भी आरोपियों की गिरफ्तारी नहीं हुई है। हालाँकि मामले की न्यायिक जाँच शुरू हो गई है। विशेष बात यह है कि अजाक थाने में पीड़िता की ओर से दर्ज करायी गई एफआईआर में आरोपी के नामों का खुलासा किया गया था लेकिन आरोपियों को गिरफ्तार करने में कोई तत्परता पुलिस विभाग द्वारा नहीं दिखाई गई बल्कि मामले के उजागर होने के बाद दो पुलिसकर्मियों के ट्रांसफर कर दिए गए। बाकि दो के बारे में किसी भी प्रकार की कोई जानकारी विभाग द्वारा मीडिया को उपलब्ध नहीं करायी गई।
इस मामले में विभाग द्वारा इस कदर लापरवाही बरती गई कि इतनी बड़ी घटना होने के बाद भी आरोपियों की शिनाख्त परेड तुरन्त नहीं कराई गई। बल्कि लम्बे समय के बाद 6 जुलाई के आसपास यह परेड कराई गई। जिसमें पीड़िता ने एक आरोपी की पहचान की। इस मामले की पूर्व में पुलिस विभाग की एक समिति जाँच कर रही थी लेकिन 7 जुलाई को इस मामले की न्यायिक जाँच शुरू की गई है। जिसके इनचार्ज आमला के मजिस्ट्रेट ए.के.गुप्ता हैं। इस समिति द्वारा जाँच कब तक पूरी कर ली जाएगी इसके बारे में कोई जानकारी नहीं है।
गौरतलब है कि ऐसे मामलों में पीड़िता का मेडीकल परीक्षण चौबीस घंटे के भीतर कराए जाने का प्रावधान है परन्तु इस प्रकरण में पीड़िता जानकी बाई का मेडीकल होने में 36 घण्टों से भी ज्यादा का समय लगा। पीड़िता एक निरक्षर महिला है और उसे कानून की जानकारी भी नहीं है जिसके कारण उसकी दु·ाारियाँ कहीं ज्यादा हैं। इस पूरे प्रकरण की शुरूआत 11 अप्रैल 2009 को हुई जब पीड़िता जानकी बाई की बहू कविता ने अपने पति कैलाश, ने आमला थाने में अपने पति कैलाश, सास जानकी, ससुर सुमरन और देवर जगदीश के खिलाफ दहेज प्रताड़ना की शिकायत दर्ज करवाई गई। आमला थाने के शिकायत रजिस्टर में यह शिकायत 162/09 दर्ज है। धारा 498 (अ) और दहेज एक्ट की धारा 3,4 के तहत। इस शिकायत पर कार्यवाही करते हुए पुलिस ने 13 अप्रैल 2009 को कविता के पति कैलाश को गिरफ्तार किया और दिनांक 15/04/2009 को न्यायालय में पेश किया। जहाँ से उसे बाद में जमानत मिल गई।
कैलाश के अनुसार जब उसे गिरफ्तार किया गया था तो पुलिस कर्मियों ने उससे दस हजार रूपयों की रि·ात माँगी थी।
इसके बाद आमला पुलिस द्वारा 02 जून 2009 को सुमरन, जानकी और जगदीश को जम्बाड़ा स्थित उनके घर से गिरफ्तार कर मुलताई अदालत में पेश किया गया। जहाँ पर तीनों की जमानत अर्जी खारिज़ होने के बाद इनको न्यायिक हिरासत में भेजे जाने का आदेश न्यायालय द्वारा दिया गया। जिसके आधार पर आरोपी सुमरन और जगदीश को पुलिस ने न्यायिक हिरासत में भेज दिया। जबकि जानकी को लेकर पुलिस आमला थाने में लौट आई। रात्रि के समय जानकी बाई को थाने में ही रखा गया।
जानकी बाई को जिला जेल, बैतूल में दाखिल न करवाने का कारण आमला पुलिस द्वारा यह दिया गया कि जानकी बाई के मामले में न्यायालय का निर्णय शाम को 6-6.30 के आसपास आया और मुलताई से बैतूल ले जाने में तकरीबन आधा घण्टे से ज्यादा का समय लगता और चूँकि जिला जेल में कदियों को दाखिल कराने का समय शाम 6 बजे समाप्त हो जाता है। इसलिए जानकी बाई को बैतूल ले जाने के स्थान पर वापस आमला थाने में लाया गया। जबकि किसी भी महिला को थाने में रात भर रखना गम्भीर चूक है।
रात्रि के समय जानकी का बड़ा बेटा कैलाश थाने में उसके लिए खाना लेकर आया। तब थाने में मौजूद पुलिसकर्मियों द्वारा उसे बीयर लाने को कहा गया। कैलाश ने कुछ देर बाद उन लोगों को थाने में बीयर लाकर दी और उसके बाद खाने का कुछ सामान भी लाकर दिया। जानकी बाई को खाना खिलाकर और शीघ्र जमानत करवाने का आ·ाासन देकर कैलाश रात्रि को 10.30 बजे घर लौट गया। थाने में बैठी जानकी बाई को जब नींद आने लगी तो उसने थाना प्रभारी से पूछा कि क्या वो बाहर के आँगन में जहाँ पर पुलिसकर्मी बैठते हैं वहीं पर सो जाए। दरअसल जानकी अन्दर जाकर सोने में डर रही थी। अनुमति मिलते ही जानकी ने उस गमछे को ज़मीन पर बिछा लिया जिसमें उसके लिए खाना बाँधकर लाया गया था। कुछ घण्टों के बाद ही एक पुलिसकर्मी द्वारा उसका हाथ पकड़कर उसे उठाया गया और उसे जबरदरस्ती पुलिस थाने में ही पीछे की ओर बने एक कमरे में जानकी को ले जाया गया। जहाँ पर थाने में पदस्थ नंदकिशोर मिश्रा एवं अन्य तीन पुलिसकर्मियों ने उसके साथ दुष्कर्म किया। कुकर्म के साथ ही पुलिसकर्मियों द्वारा उसे धमकी भी दी गई।
जबकि इस पूरे मामले को नकारते हुए आमला पुलिस का कहना था कि जब शाम को जानकी को वापस आमला थाने में लाया गया था तो तत्काल ही महिला कोटवार फूला बाई को थाने में बुलवाया गया था। फूला बाई का भी यही कहना है कि वो पूरे समय जानकी के साथ थी। दोनों ने मिलकर खाना खाया और फिर परिवार परामर्श केन्द्र के कमरे में जो थाना परिसर में है, दरवाजा बन्द करके सो गर्इं।
जानकी के बेटे कैलाश के अनुसार 2 जून की रात को थाने में मिश्रा सहित तकरीबन पाँच पुलिसकर्मी थे। थाने में कोई महिला पुलिसकर्मी मौजूद नहीं थी। यहाँ तक कि फूला बाई के वहाँ होने की बात से भी कैलाश ने इन्कार किया है। यहाँ तक कि बैतूल जिला जेल में जानकी बाई को दाखिल कराने फूला बाई आई थी। इस बात का भी कोई साक्ष्य नहीं है।
3 जून को दिन में बैतूल जाने वाली पेसेंजर ट्रेन में बिठाकर जानकी को बैतूल लाया गया।उस समय उसके साथ एक आरक्षक मौजूद था। स्टेशन पर ही बैतूल की एक महिला आरक्षक हेमलता आई और उसके साथ जानकी को जिला जेल ले जाया गया। महिला आरक्षक हेमलता ने जिला जेल में जानकी को दोपहर 1.10 पर दाखिल कराया।
जिला जेल के रिकॉर्ड में महिला आरक्षक हेमलता द्वारा जानकी को दाखिला करवाने की बात दर्ज है। महिला कोटवार उस समय वहाँ मौजूद नहीं थी।
जेल में बन्द जानकी ने दोपहर के समय ड¬ूटी कर रही महिला प्रहरी मुन्नी बाई को बताया कि उसके साथ आमला थाने के चार पुलिसकर्मियों द्वारा बलात्कार किया गया है। दरअसल यह बात जानकी द्वारा मुन्नी बाई को इसलिए बताई गई क्योंकि शाम के समय महिला कैदियों को दवा देने के लिए जेल का कम्पाउंडर वि·ान्त निर्मल जॉर्ज आया हुआ था। जिससे जानकी ने कहा कि उसके शरीर में बहुत दर्द हो रहा है और उसे दवाई चाहिए। तब महिला प्रहरी मुन्नी बाई ने इसका कारण जानना चाहा था और फिर यह पूरा मामला सामने आया। कम्पाउंडर ने इसकी रिपोर्ट जेल के जेलर बेग को की तो उन्होंने खुद जानकी से बात की और फिर एक आवेदन बनाया और उसकी प्रति एसपी, कलेक्टर, न्यायालय,मुलताई के साथ ही जिला न्यायाधीश, बैतूल व जेल मुख्यालय, भोपाल को भेजी। साथ ही जानकी कीफौरन मेडिकल जाँच करवाने के लिए उन्होंने एक आवेदन आरआई को भेजा लेकिन वहाँ से कोई पुलिसकर्मी नहीं आया। इसलिए जानकी का मेडीकल नहीं हो सका। हालाँकि शाम के समय एसडीओपी सीमा अलावा और एडीशनल एसपी भदौरिया जेल पहुँचे और उन्होंने जेलर से इस बारे में चर्चा की और जानकी से बात की। इतना ही नहीं एसडीओपी सीमा अलावा ने जानकी की जाँच भी की। दो से तीन घण्टे तक एसडीओपी और एडीशनल एसपी जेल में रहे।
4 जून को जानकी द्वारा दिए गए आवेदन के आधार पर अजाक थाने में एफआई आर दर्ज की गई। जब आरआई से कोई नहीं आया तो जेलर द्वारा एडीएम को इस बारे में आवेदन दिया गया। तब एडीएम ने जिला अस्पताल की महिला डॉक्टर वंदना भोगरे और तीन नर्स -- प्रियंका झरखड़े, अंकिता साहू और सुमन बाई को जानकी की मेडीकल जाँच के लिए भेजा। दोपहर 12 बजे जानकी की मेडीकल जाँच जेलर के कक्ष में की गई। जाँच के समय महिला प्रहरी मुन्नी बाई, जानकी और डॉक्टर वंदना भोगरे और तीनों नर्स मौजूद थीं। जाँच के बाद डॉक्टर ने एक स्लाइड और अपनी रिपोर्ट जेलर के हवाले की। इस मामले में एक महत्वपूर्ण साक्ष्य था वो गमछा जिसे बलात्कार के बाद जानकी बाई ने अपने शरीर को ढाँका था लेकिन जब पीड़िता के कपड़ों की जब्ती की गई तो इसे पुलिस ने पूरी तरह से नजरअन्दाज कर दिया। पुलिस का कहना था कि इस बारे में उनको पीड़िता ने कोई जानकारी नहीं दी। पीड़िता कोई शिक्षित और जागरूक महिला तो थी नहीं जो पुलिस को एक-एक सुराग देती। 05 जून को पीड़िता के वकील ने जानकी की जमानत के लिए एक आवेदन अदालत में दिया। जिसकी सुनवाई के लिए जानकी को न्यायालय ले जाया गया। चूँकि उस दिन जेल के दूसरे कैदियों की भी अदालत में पेशी थी इसलिए सभी को एक साथ न्यायालय ले जाया गया। न्यायालय से ही एक अन्य पुलिस जीप में जानकी को बिठाया गया और उसे आमला थाने ले जाया गया। जहाँ एसडीओपी सीमा अलावा और एडीशनल एसपी भदौरिया मौजूद थे। कुछ समय उसे थाने में रखा गया और बाद में वापस न्यायालय में भेज दिया गया। अदालत में जानकी सहित सुमरन, जगदीश की भी जमानत हो गई। यह आदेश शाम को देर से हुआ। अदालत से जानकी को दूसरे कैदियों के साथ जिला जेल भेज दिया गया। जेल में राज्य महिला आयोग की दो सदस्य सुषमा जैन और डॉ. कमला वाडिया ने जानकी से मुलाकात की। और पूरे मामले पर अपनी प्रतिक्रिया दी।
5 जून को ही राज्य महिला आयोग की बेच बैतूल में होने वाली थी। आयोग के दो सदस्य सुषमा जैन और डॉ. कमला वाडिया ने जेल में मुलाकात करने के साथ ही डॉ. कमला वाडिया ने जानकी की मेडीकल जाँच भी की और मीडिया को बयान देते हुए उन्होंने कहा था कि जाँच के बाद इस बात की पुष्टि होती है कि जानकी के साथ ज्यादती की गई।
06 जून को सुबह 9 बजे जानकी को जिला जेल से रिहा कर दिया। जानकी ने बाहर आकर यह बयान दिया आमला थाने में मिश्रा और तीन अन्य पुलिसकर्मियों ने उसके साथ जबरदस्ती की साथ ही उस पर दबाव डाला कि वो घटना के बारे में किसी को न बताए। यदि उसे कुछ होता है तो उसकी ज़िम्मेदारी मिश्रा व आमला के टीआई पर होगी।
इस पूरे मामले की जाँच के लिए 5 जून को एक जाँच समिति गठित की गई जिसमें अजाक थाने के डीएसपी अरूण योगी, एसडीओपी सीमा अलावा, एडीशनल एसपी धर्मेन्द्र सिंह भदौरिया शामिल थे। अगले दिन 6 जून को जाँच समिति में परिवर्तन करते हुए हरदा रेंज के वरिष्ठ अधिकारी बी.बी. शर्मा के साथ ही अरूण योगी को जाँच समिति में रखा गया जबकि स्थानीय अधिकारियों को जाँच से अलग कर दिया गया।
पीड़िता ने प्रशासन सुरक्षा की गुहार थी लेकिन लम्बे समय तक गाँव में स्थित पीड़िता के घर कोई पुलिस वाला दिखायी नहीं दिया। राहत राशि के रूप में 50,000 रूपए प्रदान किए गए हैं।
अब देखना यह है कि जिस न्याय की आस जानकी बाई को है क्या वह उसे मिलेगा? समितियाँ जाँच पर जाँच कर रही हैं लेकिन आरोपी पकड़ से बाहर हैं। वैसे यह कोई पहला मामला नहीं है इससे पहले भी वर्दीधारियों ने ऐसे कुकर्मों को अंजाम दिया है।

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zindagi

ज़िन्दगी से बच के कहाँ जाऊँगा ,जब हर दिशा में उसे ही पाऊंगा
कभी कभी तो लगता है उसकी मज़बूत शिला पर
टूट के रह जाऊँगा
ज़िन्दगी से बच के कहाँ जाऊँगा

फ़िर लगता है ...
काश के एक सहारा मिल जाता
मेरी नाव को भी किनारा मिल जाता
पर शायद सहारे की उम्मीद में
डूब कर रह जाऊँगा
ज़िन्दगी से बच के कहाँ जाऊँगा
फ़िर अन्दर से आवाज़ आयी..........
मैं जनता हूँ ये सफर अकेले ही तय करना होगा
उस कठिन चढाई को भी अकले ही चढ़ना होगा
और इस बात का पूरा यकीन हैं के एक दिन
उस चोटी पर अपना ही झंडा fehraunga
zindagi se bach ke nahi jaaunga
main zindagi ko apnaunga!

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अब मुझे सो जाना चाहिए।।

सोच रहा हूं कि आज कुछ लिख ही लूं, नहीं रहने दिया जाए... रात के दो बज चुके हैं... 16-17 घंटे हो चुके हैं काम करते करते, दिमाग़ को आराम दिया जाए। सुबह फिर दफ़्तर आना है। आप भी छोड़िए, क्या पढ़ रहे हैं, अजी रहने दीजिए। देखिए मैं बिल्कुल भी लिखने के मूड में नहीं हूं... अरे, आप भी अजीब हैं, कह दिया ना लिखने का इरादा नहीं है। ग़ज़ब है, भई कोई ज़ोर ज़बरदस्ती है क्या... नहीं लिखना तो नहीं लिखना। वैसे भी इस वक़्त सूनी रातों में बारिश की तेज़ बूंदे चीख-चीख कर कह रही हैं कि डरो.. मुझसे ख़ौफ खाओ। लेकिन, जब ये स्याह रात मुझे लिखने से नहीं रोक पा रही तो भला मैं आपको पढ़ने से कैसे रोक सकता हूं। लेकिन सच कहूं ये उनींदी आंखें और की-बोर्ड पर कांपती उंगलियां बिल्कुल भी लिखने की इजाज़त नहीं दे रही। जाने मन क्यूं बेचैन है, जाने तरह-तरह के ख़्याल आ रहे हैं। जाने क्यूं लग रहा है कि लिख देने से सब ठीक हो जाएगा। मैं आपको इस लेख को पढ़ने से इतना मना कर चुका हूं कि मुझे पूरा भरोसा है कि आप अब तक इसे पढ़ना बंद कर चुके होंगे। अगर ऐसा है तो चलिए मैं आपको बताता हूं मेरे अंदर और बाहर क्या चल रहा है। शुरुआत अपने पास से करता हूं... अरे भई तुम क्यूं आ गए भला, तुम्हे भी की-बोर्ड के आस-पास बने चाय के धब्बे अब ही नज़र आने थे... ठहरो-ठहरो, आ गए हो तो साफ़ कर ही लो। हो गया... मेरे सामने बहुत से टीवी चैनल चल रहे हैं, एक में समलैंगिकता पर ज़ोर शोर से विमर्श चल रहा है। वैसे ये मुद्दा है बहुत दिलचस्प, कभी सोचा भी नहीं था इस पर भी विमर्श हो सकता है !! शायद हम उस मुहाने पर खड़े हैं जहां नया पाने की हसरत में फेंका हुआ कूड़ा ही हमारा हासिल रह गया है। छोड़िए, मेरे चैनल पर छत्तीसगढ़ में शहीद हुए जवानों की ख़बर चल रही है, आपको पता है ना... छत्तीसगढ़ में रविवार को जो कुछ हुआ, वैसे ये संवेदनशील मुद्दा है। क्या ये वाकई गंभीर मसला है, तो फिर हमें तकलीफ़ क्यूं नहीं हो रही। ये क्या, अच्छा दिल्ली मेट्रो हादसे की ख़बर है, दिल्ली में हुआ मेट्रो हादसा भी ठीक नहीं रहा, लेकिन ये बड़ी ख़बर है... आख़िर दिल्ली की है। अरे छोड़िए हम भी कहा टीवी देखने में उलझे हुए हैं, आपको पता है आज यहां झमाझम बारिश हुई, सावन का पहला सोमवार और बारिश की तीखी फुहारें... इसकी दरकार तो थी। वैसे इस बार देश की तमाम जगहों पर मॉनसून के देरी से पहुंचने से जो नुकसान होना था वो तो हो गया लेकिन रही कसर बारिश के न होने ने पूरी कर दी है। सोचिए अगर ठीक बारिश नहीं होगी तो क्या होगा, केंद्र सरकार का 9 फ़ीसदी की विकास दर का लक्ष्य पूरा नहीं हो पाएगा, महंगाई भी बढ़ जाएगी... अरे केंद्र को राज्यों को स्पेशल पैकेज भी तो देने होंगे। लेकिन क्या राज्य सरकारें किसानों को स्पेशल पैकेज देगी, नहीं ना। यार फिर तो भीखू मुश्किल में पड़ जाएगा, क्योंकि खुदकुशी तो वो करेगा नहीं और रही बात पलायन की तो गांव वो छोड़ सकता नहीं। फिर भीखू करेगा क्या, लगता है आप भीखू से मुख़ातिब नहीं। मैं आपको रूबरू कराता हूं, दरअसल भीखू नाम से ही भीखू है। भीखू का गांव में अच्छा ख़ासा रसूख़ है, ज़मीन भी ठीक ठाक है। भीखू की खेती की लोग मिसालें दिया करते थे, लेकिन इधर 5-10 बरसों में हालात ज़रा बदले हैं, खेती पर असर दिखने लगा है। एक तो परिवार छोटा, तिस पर मज़दूर नहीं मिल रहे आजकल। थोड़ी मुश्किल तो पेश आ रही है भीखू को, और ये अकाल की दस्तक, पेशानी पे बल पड़ना लाज़मी है। ख़ैर, इन भीखुओं की अब आदत पड़ चुकी है, और कौन सी खेती ही करती रहनी है... 2-4 बरस और फिर भीखू का शहर गया बेटा कमाने जो लगेगा... फिर किसे करनी खेती ? मैं सोचूं कि जिस भीखू का बेटा शहर न गया हो पढ़ने, उसका क्या होगा ? कहां 3-4 लाख सालाना निकल ही आता था पहले, लेकिन अब शहर में इतना भी नहीं कि इनकम टैक्स के दायरे में आ सकें। फिर भी चेहरे पे ख़ुशी है, हां कौन गांव में रहे। अब देखो भला, बाहर बारिश पड़ रही है, और मैं मज़े से लिख रहा हूं, अभी गांव होता तो बिना बिजली के मच्छर से संग्राम हो रहा होता। ठीक कह रहा हूं ना मैं... लेकिन अगर मैं इतना ही ख़ुश हूं तो रात के ढाई बजे क्यूं जाग रहा हूं, क्यूं उसे याद कर रहा हूं जिसे मैं पसंद नहीं करता, क्यूं पागलों जैसे कुछ भी लिखे जा रहा हूं। लगता है मुझे सो जाना चाहिए।

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